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Indomitable struggle even at the age of 78: Ram Agya supports his family by selling traditional UP food in Asansol

নির্ভীক বাংলা নিউজ ডেস্ক
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October 13, 2026 at 02:55 PM
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Indomitable struggle even at the age of 78: Ram Agya supports his family by selling traditional UP food in Asansol
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बंगाल मे मिल रहा है बिहार और यूपी का भूंजा का सवाद

खीरा बेचा तो मिला हिरा का नाम जब भूंजा बेचा तो भुंजे की सोन्ही खुसबू ने दिया भगत का नाम

हिरा से बने भगत के चना बादाम चिड़े भाजा और भुट्टे की सोन्ही खुसबू से सुगंधित हो जाता है पूरा बीएनआर इलाका

कभी झाल मुढ़ी तो कभी पोपकोन तो कभी चना बादाम का स्वाद चखने के लिये लगी रहती है लोगों की लाइने

78 वर्ष की उम्र मे लोगों के किये प्रेरणा बन रहे हैं रोजगार की तलाश मे यूपी से बंगाल आए यूपी के मोर्या

आसनसोल, पश्चिम बंगाल का आसनसोल इलाका वह इलाका जो बहोत ही कम समय मे काफी तेजी के साथ विकसित हुआ है, साथ मे विकसित हुआ है यहाँ के रहने वाले लोगों का रहन- सहन यहाँ का खान -पान पर आज भी यहाँ का माछ- भात के साथ यहाँ की मिठाइयाँ लोगों को काफी लुभाती है, लजीज खानो व मिठाईयों के स्वाद का डंका पुरे देश तो देश विदेशों मे भी बजता है, खासकर अगर हम बात करें यहाँ के रसगुल्लों की तो उसके स्वाद के आगे तो कुछ कहना ही नही है, इसी खाने -पिने के स्वाद के बिच आसनसोल के बीएनआर मे स्थित रबिन्द्र भवन के ठीक सामने एक ठेले पर उत्तर प्रदेश गोरखपुर के देवरिया से रोजगार की तलाश मे 12 से 14 वर्ष की उम्र मे आए राम आज्ञा कुशवाहा उर्फ़ मोर्या कब और कैसे हिरा बन गए उनको पता ही नही चला, राम आज्ञा की अगर माने तो वह यूपी गोरखपुर के देवरिया से 1969 मे पश्चिम बंगाल के आसनसोल मे आए थे, उन्होने कहा की वह बर्णपुर के नरसिंघ बांध मे एक किराए के मकान मे रहते हैं, उनका कहना है की उस मकान मे पहले उनके पिता गया कुशवाहा रहते थे, और वो भी देवरिया से रोजगार की तलाश मे आए थे, और यहाँ गैर सरकारी कारखानों मे मेहनत मजदूरी कर अपने  तीन बेटों व अपनी पत्नी का भरण पोषण करते थे, साथ ही उन्होने अपने तीनो बेटों को उनके पैर पर खड़ा करने के लिये रानीगंज मोड़ स्थित एक पान का दुकान भी खोल रखा था, जिस दुकान मे कभी -कभी राम आज्ञा तो कभी उनके बड़े भाई नकक्षेद कुशवाहा तो कभी उनके छोटे भाई परमानन्द कुशवाहा बैठते थे और दुकान चलाते थे, उनकी पान की दुकान अच्छी खासी चल ही रही थी की पहले उनकी माँ गुजर गई जिसके कुछ वर्ष बाद उनके पिता का देहांत हो गया, माता पिता के देहांत होने के बाद मानो तीनो भाई पूरी तरह टूट गए, वो इस लिये की उनके सर से उनके परिवार के मुखिया का साया उठ चूका था, जो हर अच्छे और भले मामलों पर अपनी भूमिका बाखूबी निभाते थे, और अपने तीनो बेटों को अपनी अनुसासन से साज-संवार के रखते थे, पर पिता का साया अचानक से सर से उठने के बाद मानो तीनो भाई पूरी तरह टूट कर बिखर गए, काफ़ी समय के बाद तीनो भाई दोबारा अपनी हिम्मत जुटाकर दुकान खोलकर चलाने लगे उसी बिच बड़े भाई गया कुशवाहा की थोड़ी तबियत बिगड़ी और उनकी मौत हो गई बड़े भाई की हुई मौत ने एक बार फिर दोनों भाइयों को तोड़ कर रख दिया, जिसमे से छोटे भाई परमानन्द वापस यूपी गोरखपुर के देवरिया अपने गाँव चले गए, और वह वहीं बस गए, पर राम आज्ञा कुशवाहा ने हिम्मत नही हारी और वह आसनसोल मे ही अकेले कड़ी मेहनत और मजदूरी कर अपनी जीवन का एक इतिहास गढ़ने मे जुट गए, राम आज्ञा के छोटे भाई ने उनको काफ़ी समझाया की वह सबकुछ छोड़कर वापस अपने गाँव आ जाए पर राम आज्ञा ने अपने छोटे भाई की एक नही सुनी और वह आसनसोल मे ही ढिंट के तरह डेट रहे, शायद इसी वजह से उनका नाम मोर्या पड़ा और यूपी देवरिया उनके गाँव के लोग उनको मोर्या के नाम से बुलाने लगे, आसनसोल बीएनआर मे वह खीरा बेचने का काम सुरु किये, खीरा बेचते -बेचते उनको लोग मोर्या से हिरा के नाम से बुलाने लगे, जब बीएनआर मे रबिन्द्र भवन का निर्माण हुआ, और जब वहाँ लोगों की चहल- पहल सुरु हुई तब उन्होने अपने धंधे को बदला और वह यूपी और बिहार का काफ़ी पसंदीदा खाने का सामान भूंजा बेचने लगे, चना, बादाम, चिड़े भाजा, और भुट्टे को वह चूल्हे पर जब भी भुंजते तब-तब उसकी सोन्ही खुसबू से पूरा बीएनआर इलाका सुगंधित हो जाता, लोग भुंजे की सोन्ही खुसबू को सूंघते -सूंघते ठेले तक पहुँच जाते, और उनकी काफी तारीफ करते, साथ ही लोग उनसे चिड़े भाजा, चना, बादाम, पोपकोन, झाल मुढ़ी खरीदने के लिये लम्बी -लम्बी कतारें लगा देते, मौर्य से हिरा के नाम की उपाधि पाने वाले 78 वर्षीय बुजुर्ग की सोन्ही व अद्भुत भुंजे के स्वाद ने लोगों के ऊपर कुछ इस कदर अपने स्वाद का जादू किया है, की लोगों ने अब उनका नाम भगत रख दिया है, और जबतक लोग उनके हांथों से भुने हुए भूंजा नही खा लेते लोगों का मन नही भरता, मोर्य से हिरा और हिरा से भगत का नाम पाए राम आज्ञा कुशवाहा बताते हैं की प्रतिदिन उनको ढाई सौ से तीन सौ रुपए की कमाई हो जाती है, वह कहते हैं जब भी लोग उनके हांथों से भुने हुए भुंजे वा झाल मुढ़ी की तारीफ करते हैं, तो उनको बहोत अच्छा लगता है, उनका और भी उनके कार्य के प्रति मनोबल बढ़ता है, और इस मनोबल के सामने वह अपने सारे गम भूल जाते हैं, राम आज्ञा बताते हैं की यूपी के देवरिया गाँव पर उनकी पत्नी के आलावा उनके पाँच बच्चे हैं, जिनमे से चार बेटी और एक बेटा है, दो बेटियों की उन्होने भूंजा बेचकर ही शादी की है, बाकि की दो बेटियाँ और एक बेटा पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिये भी वह अच्छा लड़का और घर परिवार देख रहे हैं, उनकी भी शादी वह बहोत जल्द कर देंगे, रही बात बेटे की तो वह पढ़ाई के साथ -साथ काम भी करता है, वह अपनी जिम्मेदारी अभी से ही समझने लगा है, जो काफ़ी ख़ुशी की बात है, बेटे की यह समझदारी मेरा सीना और भी चौड़ा कर देती है, वह कहते हैं, जबतक मेरा शरीर चल रहा है, चल रहा है जिस दिन थक जाएंगे उस समय मेरा बेटा सबकुछ संभाल लेगा, वह कहते हैं की उन्होने अपने बेटे की अच्छी परवरिश मे कोई कमी नही छोड़ा है, जिसका नतीजा यह है की वह पढ़ाई के साथ -साथ बहोत ही जिम्मेदारी से अपने परिवार को देख रहा है, इससे बड़ी और जीवन मे क्या चाहिए,

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প্রধান সম্পাদক ও প্রকাশক, নির্ভীক বাংলা।

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