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আসানসোল

বিহারের চালানে বাংলায় বিক্রি হচ্ছে ঝাড়খণ্ডের সন্দেহজনক অবৈধ বালি?

আসানসোল: পশ্চিমবঙ্গে বালির সরবরাহ ও দাম নিয়ে একটি গুরুতর অভিযোগ সামনে এসেছে। অভিযোগ করা হচ্ছে, সম্ভবত ধানবাদের বজরা নদীর ঘাট ও ঝাড়খণ্ডের জামতাদা এলাকা থেকে বালি তোলা হচ্ছে...

Abdul Haque
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১৬ আগস্ট, ২০২৬ এ ০৮:০১ AM
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বিহারের চালানে বাংলায় বিক্রি হচ্ছে ঝাড়খণ্ডের সন্দেহজনক অবৈধ বালি?
আসানসোল: পশ্চিমবঙ্গে বালির সরবরাহ ও দাম নিয়ে একটি গুরুতর অভিযোগ সামনে এসেছে। অভিযোগ করা হচ্ছে, সম্ভবত ধানবাদের বজরা নদীর ঘাট ও ঝাড়খণ্ডের জ|নির্ভীক বাংলা ফটো
আসানসোল: পশ্চিমবঙ্গে বালির সরবরাহ এবং দাম নিয়ে একটি গুরুতর দাবি সামনে এসেছে। অভিযোগ, চালানের সাহায্যে ধানবাদের বজরা নদীর ঘাট ও ঝাড়খণ্ডের জামতারা এলাকা থেকে তোলা বালি পশ্চিমবঙ্গের বাজারে নিয়ে যাওয়া হচ্ছে। এই কথিত নেটওয়ার্কের মাধ্যমে প্রতিদিন প্রায় 900 ট্রাক বালি বাংলায় প্রবেশ করছে বলে দাবি করা হচ্ছে। তবে, এই অভিযোগগুলি এখনও স্বাধীনভাবে এবং আনুষ্ঠানিকভাবে নিশ্চিত করা হয়নি। তদন্তে অভিযোগের সত্যতা পাওয়া গেলে, বিষয়টি কথিত অবৈধ বালি ব্যবসার মধ্যে সীমাবদ্ধ থাকবে না, রয়্যালটি, জিএসটি, ই-ওয়ে বিল, চালান এবং আন্তঃরাজ্য পরিবহন ব্যবস্থা নিয়ে গুরুতর প্রশ্ন উঠতে পারে।দুই রুট থেকে দৈনিক ৯০০ ট্রাক প্রবেশের দাবি বালি ব্যবসার সঙ্গে যুক্ত কয়েকজনের মতে, ঝাড়খণ্ড থেকে পশ্চিমবঙ্গে বালি পরিবহনের জন্য মূলত দুটি রুট ব্যবহার করা হচ্ছে। প্রথম রুটটি ধানবাদ – মাইথন – ডিবুডি চেকপোস্ট বলে জানা গেছে। এ পথ দিয়ে প্রতিদিন প্রায় ৬০০ ট্রাক বালু প্রবেশ করছে বলে দাবি করা হচ্ছে। অভিযোগ: কিছু যানবাহনে বালি নির্দেশ করার জন্য একটি বিশেষ লাল লাইন থাকে। উপরন্তু, ট্রাক নম্বর ছাড়াও, 'KS' দিয়ে শুরু হওয়া একটি তথাকথিত কোডও নির্দিষ্ট করা আছে। কিন্তু এই কোডের আসল উদ্দেশ্য কী এবং এর কোনো বৈজ্ঞানিক ভিত্তি আছে কিনা তা তদন্তের বিষয়। দ্বিতীয় রুটের নাম জামাতারা-ছিত্তরফজান। এ পথ দিয়ে প্রতিদিন প্রায় ৩০০ ট্রাক বালু আসে বাংলায়। এভাবে উভয় রুট মিলিয়ে প্রতিদিন প্রায় ৯০০ ট্রাক বাংলায় প্রবেশ করছে বলে দাবি উঠেছে। তবে, এই সংখ্যাটি এখনও স্বাধীনভাবে এবং আনুষ্ঠানিকভাবে নিশ্চিত করা হয়নি। সবচেয়ে বড় প্রশ্ন- বিহারে চালান, বালির টিলা? পুরো ঘটনায় সবচেয়ে গুরুতর প্রশ্ন উঠছে বালির নথি নিয়ে। दावा है कि मैथन–डिबुडीह रूट से बंगाल आने वाले कुछ ट्रकों में बिहार के गया क्षेत्र से संबंधित चालान का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं जामताड़ा–चित्तरंजन रूट से आने वाले कुछ वाहनों में कथित तौर पर जमुई और डेहरी ऑन सोन से जुड़े चालान होने की बात कही जा रही है। यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—अगर ट्रक में बिहार के किसी खनन क्षेत्र का चालान है, तो उसमें लदा बालू वास्तव में कहां से आया? क्या चालान किसी वैध खनन क्षेत्र से जारी हुआ और माल किसी दूसरे स्थान से लाया गया? या फिर दस्तावेजों का कथित रूप से गलत इस्तेमाल किया जा रहा है? इन सवालों का जवाब केवल चालान, ई-वे बिल, रॉयल्टी रिकॉर्ड, वाहन नंबर, जीपीएस डेटा और संबंधित खनन विभाग के दस्तावेजों के मिलान से ही सामने आ सकता है। 16 और 18 चक्का ट्रकों का अलग-अलग हिसाब दावे के मुताबिक, 18 चक्का ट्रक के लिए करीब 850 रुपये और 16 चक्का ट्रक के लिए करीब 750 रुपये का चालान दिखाया जा रहा है। एक ट्रक में करीब 31 टन बालू लोड होने की बात कही गई है। उपलब्ध बताए गए आंकड़ों के अनुसार जीएसटी समेत प्रति ट्रक बालू की लागत करीब 19,756 रुपये बताई जा रही है। वहीं बंगाल की मंडियों में बालू करीब 1,500 रुपये प्रति टन की दर से बिकने का दावा है। 31 टन के हिसाब से कुल बिक्री मूल्य करीब 46,500 रुपये बैठता है। इस तरह दिए गए आंकड़ों में करीब 26,746 रुपये का सकल अंतर दिखाई देता है। हालांकि इसे सीधे शुद्ध मुनाफा नहीं माना जा सकता। इसमें वास्तविक परिवहन लागत, लोडिंग-अनलोडिंग, टोल, वैध रॉयल्टी, टैक्स और अन्य खर्चों को शामिल कर वास्तविक आर्थिक गणना करनी होगी। आसनसोल–दुर्गापुर होते हुए कोलकाता तक पहुंचने का दावा आरोप सिर्फ झारखंड-बंगाल सीमा तक बालू पहुंचने तक सीमित नहीं हैं। दावा किया जा रहा है कि झारखंड से आने वाला बालू आसनसोल, दुर्गापुर और आगे कोलकाता तक अलग-अलग स्टॉक पॉइंट और मंडियों में पहुंचाया जा रहा है। कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक, कुछ स्टॉक पॉइंट पर बालू करीब 1,400 रुपये प्रति टन की दर से बेचे जाने का दावा है, जबकि परिवहन खर्च अलग लिया जाता है। अगर इतनी बड़ी मात्रा में बालू अंतरराज्यीय सीमा पार कर रहा है, तो सवाल यह है कि दस्तावेजों और वास्तविक माल की जांच किस स्तर पर हो रही है? बजरा घाट से कथित अवैध बालू उठाव का आरोप कथित नेटवर्क में धनबाद–जामताड़ा क्षेत्र के बजरा नदी घाट का नाम भी सामने आ रहा है। आरोप है कि इस इलाके से बड़े पैमाने पर बालू उठाया जा रहा है। हालांकि घाट से बालू उठाने की अनुमति है या नहीं, इसकी पुष्टि केवल संबंधित विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड से ही हो सकती है। यदि बिना वैध अनुमति बालू उठाने और फिर दूसरे राज्य के दस्तावेजों के आधार पर उसे पश्चिम बंगाल ले जाने की बात जांच में सही साबित होती है, तो यह खनन और राजस्व व्यवस्था के लिए गंभीर मामला हो सकता है। 900 ट्रक रोजाना तो महीने में 27 हजार ट्रक रोजाना 900 ट्रक बालू बंगाल पहुंचने का दावा अपने आप में बड़ा है। अगर इस आंकड़े को 30 दिनों के हिसाब से देखा जाए, तो यह संख्या करीब 27,000 ट्रक प्रति माह बैठती है। इतनी बड़ी आवाजाही को लेकर कई सवाल उठते हैं— क्या प्रत्येक वाहन के चालान की जांच हो रही है? क्या ई-वे बिल और वाहन नंबर का मिलान किया जा रहा है? क्या रॉयल्टी वास्तविक बालू के स्रोत और मात्रा के अनुसार जमा हो रही है? क्या जीएसटी दस्तावेज और वास्तविक माल की मात्रा में समानता है? क्या बिहार के चालान और झारखंड से लदे बालू के बीच कोई विसंगति है? डिबुडीह और चित्तरंजन रूट से वास्तव में रोज कितने बालू लदे वाहन गुजरते हैं? दस्तावेज आधारित जांच से सामने आ सकती है सच्चाई इस पूरे मामले में सबसे अहम जरूरत स्वतंत्र और दस्तावेज आधारित जांच की है। संबंधित विभागों को यह पता लगाना होगा कि ट्रकों में मौजूद बालू वास्तव में किस नदी घाट से लोड हुआ, चालान किस खनन क्षेत्र का है, रॉयल्टी कहां जमा हुई और वाहन किस रास्ते से पश्चिम बंगाल पहुंचा। इसके साथ ही डिबुडीह चेकपोस्ट और जामताड़ा–चित्तरंजन रूट के सीसीटीवी फुटेज, वाहन नंबर, टोल रिकॉर्ड, ई-वे बिल और खनन विभाग के आंकड़ों का मिलान किया जाए, तो रोजाना 900 ट्रकों की आवाजाही के दावे की वास्तविकता काफी हद तक सामने आ सकती है। वैध कारोबारियों के सामने भी चुनौती यदि कम कीमत पर कथित अवैध बालू बाजार में पहुंच रहा है, तो इसका सीधा असर वैध बालू कारोबारियों पर पड़ सकता है। एक ओर सरकार को रॉयल्टी और टैक्स के संभावित नुकसान की चिंता होगी, वहीं दूसरी ओर सस्ता माल बाजार में आने से वैध कारोबारियों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो सकती है। दावा यह भी है कि कीमत के इसी अंतर का फायदा बिचौलिये और कारोबारी उठा रहे हैं। हालांकि इस दावे की पुष्टि वास्तविक खरीद-बिक्री दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के बाद ही की जा सकती है। अब सबसे बड़ा सवाल—किसके संरक्षण में चल रहा है कथित नेटवर्क? धनबाद से मैथन–डिबुडीह, जामताड़ा से चित्तरंजन और फिर आसनसोल–दुर्गापुर होते हुए कोलकाता तक बालू पहुंचने के दावों ने पूरे कथित नेटवर्क पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर रोजाना सैकड़ों ट्रकों की आवाजाही का दावा सही है, तो यह छोटे स्तर का कारोबार नहीं बल्कि एक बड़े अंतरराज्यीय बालू सप्लाई नेटवर्क की ओर इशारा कर सकता है। फिलहाल कई सवालों के जवाब बाकी हैं— बिहार का चालान झारखंड के बालू के साथ कैसे इस्तेमाल हो रहा है? बजरा घाट से बालू उठाने की अनुमति है या नहीं? रोजाना 900 ट्रकों की एंट्री का दावा कितना सही है? और अगर दस्तावेजों और वास्तविक माल में अंतर है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? इन सभी सवालों का जवाब चालान, ई-वे बिल, रॉयल्टी रिकॉर्ड, वाहन नंबर, सीसीटीवी फुटेज और संबंधित विभागीय दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।

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প্রধান সম্পাদক ও প্রকাশক, নির্ভীক বাংলা।

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